बुधवार, 2 मार्च 2016

नफ़रत से बडा कोई पाप नही.

देश विदेश मे हो रहे आतंकवादी हमलो पर मेरी ये छोटी सी कविता.. सायद ये कविता उन इन्सानियत के दुश्मनो के लिये एक छोटा सा जवाब बन पाये.... 
कभी इसे मारते हो,
कभी उसे मारते हो,
अरे! कब तक मारोगे 
कब तक निर्दोषो का खुन बहाओगे,
कब तक मानवता को
सांप्रदाय के नाम पर बांटोगे,
कब तक बंदूक कि नोक पर 
दुनिया को डराओगे,
आखिर कब तक !
कब तक युं ही,
मौत का तांडव रचाओगे,
अब बस भी करो ! बहुत हुआ.
अब बंद करो ये खुन कि होली,
यह खेल लहु का,
देखो तुम्हे दुनिया नम
आंखों से देख रही.
याचना कर रही है तुम से,
कि अब तो रुक जाओ !
एक बार सबको गले
लगा कर तो देखो.
शायद तुम्हे भी समझ आ जाये,
कि प्रेम से बड़ा कोई पुण्य नही
नफरत से बड़ा को पाप नही...

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