बुधवार, 2 मार्च 2016

मानो नही जानो

मानने के धोखे में मत पड़ना। जानने की यात्रा करो। जानो तो निश्चित देव ही है, पत्थर तो है ही नहीं। मूर्तियों में ही नहीं, पहाड़ों में भी जो पत्थर है वहां भी देवता ही छिपा है। जानने से तो परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं है। जाना कि परमात्मा के द्वार खुले– हर तरफ से, हर दिशा से, हर आयाम से। कंकड़- कंकड़ में वही है। तृण-त्तृण में वही है। पल-पल में वही है। लेकिन जानने से। विश्वास से शुरू मत करना; बोध से शुरू करना। विश्वास तो आत्मघात है। अगर मान ही लिया तो खोजोगे कैसे? और तुम्हारे मानने से सत्य कैसे हो सकता है? एक क्षण पहले तक तुम्हें पत्थर दिखाई पड़ता था, और अब तुमने मान लिया और उसमे देवता देखने लगे। देवता देखने लगे चेष्ठा करके, लेकिन भीतर किसी गहराई में तो तुम अब भी जानोगे न कि पत्थर है! उस भीतर की गहराई को कैसे बदलोगे? संदेह तो कहीं न कहीं छिपा ही रहेगा, बना ही रहेगा। इतना ही होगा कि ऊपर-ऊपर विश्वास हो जाएगा; संदेह गहरे में सरक जाएगा। यह तो और खतरा हो गया। संदेह ऊपर-ऊपर रहता, इतना हानिकर नहीं था। यह तो संदेह और भीतर चला गया, और प्राणों के रग-रग में समा गया। यह तो तुम्हारा अंतःकरण बन गया। यही तो हुआ है। दुनिया में इतने लोग हैं, करोड़ों-करोड़ों लोग मंदिर जाते हैं , मस्जिद जाते हैं, गुरुद्वारा जाते हैं, चर्च जाते हैं और इनके भीतर गहरा संदेह भरा रहता है। ईसाई और हिंदू और मुसलमान सब ऊपर-ऊपर हैं और भीतर संदेह की आग जल रही है। और वह संदेह ज्यादा सच्चा है, क्योंकि संदेह तुमने थोपा नहीं है। ज्यादा स्वाभाविक है। और तुम्हारा विश्वास थोपा हुआ है, आरोपित है। आरोपित विश्वास, स्वाभाविक संदेह को कैसे मिटा सकेगा? आरोपित विश्वास तो नपुंसक है। स्वाभाविक संदेह अत्यंत ऊर्जावान है। इसलिए मैं कहता हूँ, विश्वास नहीं बोध,चाहिए |ज्ञान के पहले संदेह जरूरी है| आज विश्वास नहीं संदेह की जरूरत है| ताकि वास्तविक खोज शुरू हो सके| संदेह हीं तो आज विज्ञानं (बोध,ज्ञान) का जन्मदाता है| भगवान पर संदेह करो ताकि एक दिन भगवान को जान सको| इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ, “मानो नहीं, जानो|”

राजा बनना है, तो राजा की तरह सोचें

राजा बनना है, तो राजा की तरह सोचें
।।दक्षा वैदकर।।
हमने बचपन से ही अलग-अलग व्यक्तियों के बारे में अलग-अलग तरह की बातें देखी-सुनी हैं. हमने हमेशा सुना कि किसी गरीब व्यक्ति की लॉटरी निकल गयी या उसे जमीन बेच कर ढेर सारे रुपये मिले, लेकिन कुछ साल बाद वह व्यक्ति वापस गरीब हो गया. वहीं दूसरी तरफ यह पाते है कि एक धनवान व्यक्ति व्यापार में घाटे के कारण गरीब हो गया और कुछ सालों बाद वह पुन: अमीर दिखायी देता है. इसका सीधा संबंध सोच से है. व्यक्ति केवल पैसे से अमीर-गरीब नहीं होता, सोच से भी अमीर-गरीब होता है.?
एक राजा का जन्मदिन था. सुबह जब वह घूमने निकला, तो उसने तय किया कि वह रास्ते में मिलनेवाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा. उसे एक भिखारी मिला. भिखारी ने राजा से भीख मांगी, तो राजा ने भिखारी की तरफ एक तांबे का सिक्का उछाल दिया. सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर नाली में जा गिरा. भिखारी नाली में हाथ डाल तांबे का सिक्का ढूंढ़ने लगा. राजा ने उसे बुला कर दूसरा तांबे का सिक्का दिया. भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूंढ़ने लगा.
राजा को लगा की भिखारी बहुत गरीब है, उसने भिखारी को चांदी का एक सिक्का दिया. भिखारी राजा की जय जयकार करता फिर नाली में सिक्का ढूंढ़ने लगा. राजा ने अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया. भिखारी खुशी से झूम उठा और वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा. राजा को बहुत खराब लगा. उसे खुद से तय की गयी बात याद आ गयी कि पहले मिलनेवाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है. उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूं, अब तो खुश व संतुष्ट हो? भिखारी बोला, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूंगा जब नाली में गिरा तांबे का सिक्का मुङो मिल जायेगा.
जो व्यक्ति अपने सोच में परिवर्तन नहीं लाता है. वह व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता, इसलिए अग्रणी व्यक्ति की तरह सोचें. यदि आपको राजा बनना है, तो लगातार राजा की तरह सोचें. जो व्यक्ति जिस तरह का सोच रखता है तथा लगातार एक ही तरह का सोच बनाये रखता है, वह उसी तरह का बन जाता है.

मानव मस्तिष्क की कार्य प्रणाली पर एक कहानी याद आती है – अरब के रेगिस्तान में ऊँट

मानव मस्तिष्क की कार्य प्रणाली पर एक कहानी याद आती है –
अरब के रेगिस्तान में ऊँटों के काफिले इधर से उधर घूमते रहते थे। एक समय की बात है कि एक ऊँटों का काफिला रात्रि विश्राम के लिये एक सराय में ठहरा। उस काफिले में सौ ऊँट थे। ऊँट मालिक जब ऊँटों को खूंटी गाड़ कर बांधने लगा तो एक रस्सी कम पड़ गयी। निन्यानवें ऊँटों को तो रस्सी से बांध दिया गया लेकिन एक ऊँट बच गया। तब उस काफिले का मालिक सराय के बूढ़े मैनेजर के पास एक रस्सी की गुहार लेकर गया। मैनेजर ने बताया कि उसके पास रस्सी तो नहीं है लेकिन वह ऊँट को बांधने की कला जानता है।
सराय के मैनेजर ने बचे हुए ऊँट के पास जाकर खूंटी गाड़ने का अभिनय किया व रस्सी खूंटी से बांध कर ऊँट की गर्दन के पास अपना हाथ इस तरह ले गया जैसे सचमुच रस्सी से बांध रहा हो। इसके बाद उसने कहा कि जाओ, तुम्हारा ऊँट नहीं भागेगा।
दूसरे दिन प्रातः काफिले के मालिक ने निन्यानवें ऊँट जो बांधे थे वे छोड़ दिये। सभी ऊँट खड़े हो कर चलने लगे। लेकिन सौवें ऊँट को वह उठाने लगा एवं उसकी पिटाई भी की लेकिन वह ऊँट टस से मस नहीं हुआ। तब काफिले वाला मैनेजर के पास गया कि आपने कौनसा मंत्रा कर दिया। मेरा ऊँट उठ नहीं रहा है। इस पर मैनेजर ने पूछा कि तुमने उसकी रस्सी खोली या नहीं। ऊँट वाला बोला, ‘‘जब रस्सी बांधी ही नहीं थी तो खोलता कैसे ?’’ इस पर मैनेजर उठ कर ऊँट के पास गया व रस्सी खोलने का अभिनय किया व ऊँट को उठाया तो वह उठ कर चलने लगा।
हम सब भी अज्ञात, अदृश्य इसी तरह की धारणाओं की रस्सियों से बंधे हुए हैं। ऊँटों का तो पता नहीं, लेकिन मनुष्य पर यह बात शत-प्रतिशत सही बैठती है।
सीमित धारणाएं व्यक्ति के सोच को संकुचित करती हैं। व्यक्ति गहराई से, विस्तार से सोच नहीं पाता है। हमारी नकारात्मकता हम पर ढ़ेर सारे बंधन लगा देती हैं जिस में बहुत सी ऊर्जा एवं समय खर्च हो जाता है। इससे भी हम अपनी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते हैं। स्वयं के प्रति अविश्वास एवं संदेह, आत्मविश्वास की कमी, स्व-सम्मान का अभाव हमें महान् कार्य करने से रोकता है। जिसे अपने पर भरोसा नहीं होता वह अपने मस्तिष्क पर भी भरोसा नहीं कर पाता है। अर्थात हम अपनी अनेक तरह की कमजोरियों के कारण अपने ऊर्जा भण्डार, शक्ति स्रोत मस्तिष्क का पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं।
प्रत्येक मनुष्य के मस्तिष्क के भीतर विसंगत धारणाओं के कारण महाभारत का युद्ध चल रहा है। हम सब एक पल सोचते हैं कि यह करूं व दूसरे पल दूसरा विचार करते हैं जो कि उसके विपरीत होता है। इस तरह हम एक युद्धभूमि बन चुके हैं। इस प्रकार हमारी ताकत स्वयं से ही लड़ने में खर्च हो जाती है एवं हम अपने मस्तिष्क की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाते हैं।
हम अपनी आदतों, वृत्तियों में जीते हैं। हम स्वतः स्फूर्त, सहज जीवन नहीं जीते हैं। जैसी जिसकी आदतें पड़ गयी हैं वह उन्हीं लहरों में भटकता रहता है। कोई दिन भर प्रत्येक कार्य उतावल से करने में लगा है तो कोई मंद गति से। कोई आलस्य से पड़ा हुआ है तो कोई कार्य की अधिकता से परेशान है।
मनुष्य एक ऐसी बैलगाड़ी है, जिसके चारों ओर दो-दो बैल बंधे हैं। ये सभी बैल अपनी-अपनी दिशा में गाड़ी को खींच रहे हैं। ऐसे में मनुष्य कहीं नहीं पहुंच पाता है और अपने मस्तिष्क की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पाता है।

अल्लाह मेरे, दुआ मेरी कुछ काम न आई..

गुनाह किसी भी तरह का हो, गुनाह ही होता है. पर कुछ गुनाह ऐसे होते हैं जिसके लिए कोई भी सजा छोटी पड़ जाती है. कानूनी कार्रवाइयों के बाद हमारा समाज कहता है कि गुनहगार को उसके गुनाहों की सजा मिल गई जबकि हकीकत कुछ और ही होता है.
 
अभी पिछले दिनों (18 जुलाई) लड़कियों-औरतों पर तेजाब फेंकने के मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर आया. सुप्रीम कोर्ट ने इसे जहर कानून के अंतर्गत कर दिया. अब तेजाब फेंकने के लिए गुनहगार को न्यूनतम 3 वर्ष की सजा और 50 हजार रुपए का जुर्माना होगा. तेजाब की खरीद-बिक्री भी जहर कानून, 1919 के अंतर्गत होगी. तेजाब की कितनी मात्रा किसे बेची गई, इसकी जानकारी भी दुकानदारों को रखनी होगी, तो दुकानदार यह नहीं कह सकते कि बेचना उनका काम है और किसे, क्या बेचा यह उन्हें याद नहीं या इसकी कोई जानकारी नहीं है. इसके अलावे तेजाब खरीदने के लिए भी अब पहचान पत्र दिखाना होगा. किस काम के लिए इसकी खरीद की जा रही है, खरीदार को यह भी बताना होगा.
 
तेजाब की इन घटनाओं पर कोर्ट का फैसला बहुत अहम माना जा रहा था. माना जा रहा था कि इतनी बंदिशों के बाद अब शायद तेजाब फेंकने की घटनाओं में कमी आएगी. पर कोर्ट के इस फैसले के 10 दिन भी पूरे नहीं हुए कि एक और घटना सामने आ गई. आज भी अक्सर अखबारों में ऐसी खबरें देखने को मिल ही जाती हैं. यह पहले से कहीं ज्यादा डराने वाली, कानून और समाज दोनों के लिए खतरे का सूचक है. समूचे समाज को गुनाहमुक्त करना तो संभव नहीं, पर किसी भी गुनाह के लिए कानून बनाए इसलिए गए हैं ताकि इसमें कमी लाई जाए.
 
कानून कभी भी गुनाह खत्म करने की गारंटी नहीं होती लेकिन कानून उन गुनाहों को कम करने का एक महत्वपूर्ण रास्ता, एक प्रकार का संबल होता है. लेकिन इस प्रकार की घटनाएं कानून का माखौल उड़ाती हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. ऐसा होता क्यों है? सबसे ज्यादा औरतों और लड़कियों की सुरक्षा की बात करने वाला समाज, इनकी सुरक्षा के लिए चिंतित रहने वाला समाज आखिर इतने निर्भीक रूप से कानून का माखौल उड़ाते हुए क्यों अपनी बर्बरता छोड़ नहीं पाता?
 
एक सच्चाई यह भी है कि लड़कियों को अपना अधिकार क्षेत्र मानने वाला पुरुषों का रवैया भी इसके लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है. प्रेम प्रस्ताव तो छोड़िए, किसी महिला ने किसी पुरुष को किसी भी बात के लिए न कहा, इसका मतलब उस पुरुष की इज्जत कम हो गई…ऐसी ही सोच कुछ हमारे मजाक, हमारी आम बोल-चाल में भी झलकती है. ऐसा भी नहीं है कि यह सोच किसी एक तबके, किसी एक क्षेत्र विशेष की समस्या है, बल्कि हर वर्ग, हर क्षेत्र की समस्या है.
 
भारत विशेष रूप से पुरुष-प्रधान समाज के लिए से जाना जरूर जाता है, लेकिन यह समस्या विश्व के लगभग हर कोने में किसी-न-किसी रूप में देखने को मिल ही जाती है. भारत की समस्या यह है कि यहां औरतें, लड़कियां, पिता-पति और भाइयों की खानदानी जागीर मानी जाती हैं, खानदान की लाज की धारक मानी जाती है. बेटी और पत्नी घर की इज्जत होती है, इसलिए अपनी इस इज्जत को वे छुपाकर रखते हैं, कि कहीं किसी की नजर न लग जाए. यहां तक भी बहुत बुरा नहीं होता, लेकिन बुरा तब होता है जब अपनी इज्जत के अलावे वही पिता और भाई दूसरों के घर की इज्जत की तरफ नजर उठाते हैं. वह इज्जत भी इन्हें अपनी इज्जत करती हुई मिलनी चाहिए. अपनी बहन और बेटियां जब दूसरों के बेटों और पतियों के साथ बात करें तब तो इनकी इज्जत जाती ही है, हद तो तब होती है जब दूसरों की ऐसी ही बेटियां और पत्नियां अपने पिता और पति की इज्जत की खातिर या अपनी खुद की खुशी की खातिर जब (भारतीय विचारधारा के अनुसार) इन पराए पुरुषों की बात मानने से इनकार करती हैं, तो भी इनकी इज्जत पर पड़ जाती है. इस तरह यह इज्जत लड़कियों के पांवों की बेड़ियां बन जाती हैं.
ऐसी ही सोच तेजाब फेंकने जैसी वारदातें जन्म दिया करती हैं. पर वारदातें उनके लिए होती हैं, जिनके लिए यह मात्र एक हिंसक खबर है. हकीकत तो यह है कि वारदात ऐसे हमलों को बस मीडिया का दिया हुआ एक रचनात्मक नाम है, उन भुक्तभोगियों से पूछिए क्या होती हैं ये वारदातें उनके लिए, जब जिंदगी भर भगवान की दी हुई एक खूबसूरत जिंदगी को काले अंधेरे में जीने को वे मजबूर हो जाती हैं! “अल्लाह मेरे, दुआ मेरी कुछ काम न आई; इतने चराग जलाए पर रौशनी कहीं नजर न आई…..” ऐसी घुटन भरी और बेबस जिंदगी ये उम्र भर जीने को मजबूर होती हैं. तो हम कैसे कह सकते हैं कि गुनहगार को उसकी सजा मिल गई?

मुस्लिम पोपुलेशन

मुस्लिम पोपुलेशन- --जब तक मुस्लिमों की जनसंख्या किसी देश/प्रदेश/क्षेत्र में लगभग 2% के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसन्द अल्पसंख्यक बनकर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते, जैसे -
अमेरिका – मुस्लिम 0.6%
ऑस्ट्रेलिया – मुस्लिम 1.5%
कनाडा – मुस्लिम 1.9%
चीन – मुस्लिम 1.8%
इटली – मुस्लिम 1.5%
नॉर्वे – मुस्लिम 1.8%
जब मुस्लिम जनसंख्या 2% से 5% के बीच तक पहुँच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलम्बियों में अपना “धर्मप्रचार” शुरु कर देते हैं, जिनमें अक्सर समाज का निचला तबका और अन्य धर्मों से असंतुष्ट हुए लोग होते हैं, जैसे कि –
डेनमार्क – मुस्लिम 2%
जर्मनी – मुस्लिम 3.7%
ब्रिटेन – मुस्लिम 2.7%
स्पेन – मुस्लिम 4%
थाईलैण्ड – मुस्लिम 4.6%
मुस्लिम जनसंख्या के 5% से ऊपर हो जाने पर वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलम्बियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना “प्रभाव” जमाने की कोशिश करने लगते हैं। उदाहरण के लिये वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर “हलाल” का माँस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि “हलाल” का माँस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यतायें प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में “खाद्य वस्तुओं” के बाजार में मुस्लिमों की तगड़ी पैठ बनी। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्केट के मालिकों को दबाव डालकर अपने यहाँ “हलाल” का माँस रखने को बाध्य किया। दुकानदार भी “धंधे” को देखते हुए उनका कहा मान लेता है (अधिक जनसंख्या होने का “फ़ैक्टर” यहाँ से मजबूत होना शुरु हो जाता है), ऐसा जिन देशों में हो चुका वह हैं –
फ़्रांस – मुस्लिम 8%
फ़िलीपीन्स – मुस्लिम 6%
स्वीडन – मुस्लिम 5.5%
स्विटजरलैण्ड – मुस्लिम 5.3%
नीडरलैण्ड – मुस्लिम 5.8%
त्रिनिदाद और टोबैगो – मुस्लिम 6%
इस बिन्दु पर आकर “मुस्लिम” सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके “क्षेत्रों” में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाये (क्योंकि उनका अन्तिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व “शरीयत” कानून के हिसाब से चले)। जब मुस्लिम जनसंख्या 10% से अधिक हो जाती है तब वे उस देश/प्रदेश/राज्य/क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिये परेशानी पैदा करना शुरु कर देते हैं, शिकायतें करना शुरु कर देते हैं, उनकी “आर्थिक परिस्थिति” का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़फ़ोड़ आदि पर उतर आते हैं, चाहे वह फ़्रांस के दंगे हों, डेनमार्क का कार्टून विवाद हो, या फ़िर एम्स्टर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवाद को समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है, जैसे कि –
गुयाना – मुस्लिम 10%
इसराइल – मुस्लिम 16%
केन्या – मुस्लिम 11%
रूस – मुस्लिम 15% (चेचन्या – मुस्लिम आबादी 70%)
जब मुस्लिम जनसंख्या 20% से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न “सैनिक शाखायें” जेहाद के नारे लगाने लगती हैं, असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है, जैसे-
इथियोपिया – मुस्लिम 32.8%
भारत – मुस्लिम 22%
मुस्लिम जनसंख्या के 40% के स्तर से ऊपर पहुँच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याऐं, आतंकवादी कार्रवाईयाँ आदि चलने लगते हैं, जैसे –
बोस्निया – मुस्लिम 40%
चाड – मुस्लिम 54.2%
लेबनान – मुस्लिम 59%
जब मुस्लिम जनसंख्या 60% से ऊपर हो जाती है तब अन्य धर्मावलंबियों का “जातीय सफ़ाया” शुरु किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोड़ना, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है, जैसे –
अल्बानिया – मुस्लिम 70%
मलेशिया – मुस्लिम 62%
कतर – मुस्लिम 78%
सूडान – मुस्लिम 75%
जनसंख्या के 80% से ऊपर हो जाने के बाद तो सत्ता/शासन प्रायोजित जातीय सफ़ाई की जाती है, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है, सभी प्रकार के हथकण्डे/हथियार अपनाकर जनसंख्या को 100% तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है, जैसे –
बांग्लादेश – मुस्लिम 83%
मिस्त्र – मुस्लिम 90%
गाज़ा पट्टी – मुस्लिम 98%
ईरान – मुस्लिम 98%
ईराक – मुस्लिम 97%
जोर्डन – मुस्लिम 93%
मोरक्को – मुस्लिम 98%
पाकिस्तान – मुस्लिम 97%
सीरिया – मुस्लिम 90%
संयुक्त अरब अमीरात – मुस्लिम 96%
बनती कोशिश पूरी 100% जनसंख्या मुस्लिम बन जाने, यानी कि दार-ए-स्सलाम होने की स्थिति में वहाँ सिर्फ़ मदरसे होते हैं और सिर्फ़ कुरान पढ़ाई जाती है और उसे ही अन्तिम सत्य माना जाता है, जैसे –
अफ़गानिस्तान – मुस्लिम 100%
सऊदी अरब – मुस्लिम 100%
सोमालिया – मुस्लिम 100%a
यमन – मुस्लिम 100%
आज की स्थिति में मुस्लिमों की जनसंख्या समूचे विश्व की जनसंख्या का 22-24% है, लेकिन ईसाईयों, हिन्दुओं और यहूदियों के मुकाबले उनकी जन्मदर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस शताब्दी के अन्त से पहले ही मुस्लिम जनसंख्या विश्व की 50% हो जायेगी (यदि तब तक धरती बची तो)… भारत में कुल मुस्लिम जनसंख्या 15% के आसपास मानी जाती है, जबकि हकीकत यह है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और केरल के कई जिलों में यह आँकड़ा 60 से 80% तक पहुँच चुका है… अब देश में आगे चलकर क्या परिस्थितियाँ बनेंगी यह कोई भी (“सेकुलरों” को छोड़कर) आसानी से सोच-समझ सकता है…

यह हमारा आपका समाज है इसे हमने गंदा किया है

"समाज में कामुकता कौन परोस रहा है ?...कामोद्दीपन कौन कर रहा है ? हर बलात्कारी ...गली मोहल्ले के लुच्चे कामुक लफंगे से तो निपटा ही जाए पर समाज में पूनम पांडे और राखी सामंतों ,मल्लिका शेहरावतों से भी लगे हाथों निपटा जाए . चूंकि पुरुष "बहिरंग" होता है अतः उसकी लफंगई की हरकतें भी बहिरंग होती हैं और स्त्री स्वभाव से " अन्तरंग" होती है अतः उसकी लफंगई की हरकतें भी अन्तरंग होती हैं . हम जैसा समाज तैयार करते हैं वैसा ही भोगते हैं ...अभी हाल ही की दिल्ली की घटना नहीं घटनाओं पर गौर करें ...वह जो कामुक पुरुष कुत्तों जैसे सड़क पर गली चौराहों पर लार टपकाते महिलाओं को हवसी निगाहों से ताकते हैं ....
वह कुत्तों जैसे पुरुष किन कुतियों के बेटे हैं ?...किन कुतियों के प्रेमी हैं ?...और उन लडकीयों /महिलाओं पर भी गौर करें जो कल नारे लगा रही थीं --"देखने वाले तेरी नज़रों में ही पाप है / मेरी स्कर्ट से ऊंची मेरी आवाज़ है " क्या कहना चाहती हैं वह ? ...यही न कि "जैसे -जैसे उनकी आवाज़ ऊपर उठेगी उनकी स्कर्ट भी और ऊपर उठ जायेगी " ...कहा तो यह जाना चाहिए था --"देखने वाले तेरी नज़रों में "भी" पाप है / मेरी स्कर्ट से ऊंची मेरी आवाज़ है" पर इसमें तो दोष की साझेदारी हो जाती . ...बलात्कार हो जाने के बाद पुलिस /सरकार की भूमिका होती है पर बलात्कार की घटनाएं न हों इसमें सरकार की नहीं समाज की भूमिका होती है ...क्या हमारा समाज यह भूमिका निभा रहा है ? क्या आवारा कुकुरनुमा लड़कों से उनके माता -पिता पूछते हैं उनकी आवारगी के रहस्य ...क्या उनकी अदाओं पर परिवार सेंसर बोर्ड की तरह काम करता है ? ...क्या माता -बहने उनको संस्कार देती हैं ? ...क्या कंजूस कपड़ों के वाबजूद उनमें खिड़की -रोशनदान बनवाये लडकी जब कुछ कर गुजरने की तमन्ना लिए जब पढ़ने जाती है तो माँ पूछती है कि पढने जा रही हो या कैबरे करने ?
जब घर-परिवार अपने आंतरिक दायित्व में असफल हो जाता है तो समाज सेंसरबोर्ड की तरह सलीके से रहने की आचार संहिता लागू करता है ...तब चिल्ल-पों होती हैं सोसल पुलिसिंग/खाप गलत है ...कुत्तेनुमा आवारा पुरुषों की बातें तो होगई पर ताली तो दोनों हाथ से बजती है .... कुतियानुमा स्त्रीयों की भी बात तो हों नहीं तो बात एक पक्षीय ही रह जायेगी . कहा जारहा है कि समाज के 50% पुरुष चरित्रहीन हैं ...हो भी सकते हैं ...मान लिए हैं ...अब समझ लें --एक चरित्रहीन पुरुष के कम से कम दो स्त्रीयों से सम्बन्ध होना जरूरी है ...अब बताएं अगर 50% पुरुष चरित्रहीन है तो शत प्रतिशत स्त्रीयां भी तो चरित्रहीन हुईं ---इसलिए ऐसे वीभत्स तर्क न दें ...लडकियां "हौट" और "सेक्सी" अपनी प्रसंशा मानती हैं ...तो कितनी हौट और कितनी सेक्सी की पैमाइश कैसे होगी ? "...Guy with an attitude" लड़कियों में प्रचलित जुमला है ...किस बात का attitude ? प्रख्यात दार्शनिक राखी सामंत कहती हैं -"Rape is sex in surprise" एक अन्य विदुषी रीना जैन कहती हैं --"Virginity is just lack of opportunity. " --- इस समाज पर श्यापा नहीं कीजिये इसे सुधारिए ...यह हमारा आपका समाज है इसे हमने गंदा किया है ... इसे हम ही साफ़ करेंगे ."

नफ़रत से बडा कोई पाप नही.

देश विदेश मे हो रहे आतंकवादी हमलो पर मेरी ये छोटी सी कविता.. सायद ये कविता उन इन्सानियत के दुश्मनो के लिये एक छोटा सा जवाब बन पाये.... 
कभी इसे मारते हो,
कभी उसे मारते हो,
अरे! कब तक मारोगे 
कब तक निर्दोषो का खुन बहाओगे,
कब तक मानवता को
सांप्रदाय के नाम पर बांटोगे,
कब तक बंदूक कि नोक पर 
दुनिया को डराओगे,
आखिर कब तक !
कब तक युं ही,
मौत का तांडव रचाओगे,
अब बस भी करो ! बहुत हुआ.
अब बंद करो ये खुन कि होली,
यह खेल लहु का,
देखो तुम्हे दुनिया नम
आंखों से देख रही.
याचना कर रही है तुम से,
कि अब तो रुक जाओ !
एक बार सबको गले
लगा कर तो देखो.
शायद तुम्हे भी समझ आ जाये,
कि प्रेम से बड़ा कोई पुण्य नही
नफरत से बड़ा को पाप नही...

राष्ट्रपति जी ये सरकार के खिलाफ सडयंत्र है।ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी

राष्ट्रपति जी ये  सरकार के खिलाफ सडयंत्र है।ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। कानून की अनदेखी हो रही है। ये पुरस्कार लौटाना लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का मजाक है। अनुपम खेर ने भी तो लोकतान्त्रिक विरोध किया था सेना के लोग भी ऐसा विरोध  करने को तैयार बैठे है। ये पोसित सडयंत्र है। इसे तुरंत बंद करना होगा लोकतंत्र में बातचीत ही विकल्प है। कोई आपातकाल लागु  नही देस मे ये तो राजनैतिक बैकडोर की परिभासा है। जो लोग मौजूदा व्यवस्था को पचा नही पा रहे। ६८ साल से कैसे जी रहे थे अपने आकाओं को कुर्सी से अलग देखना नही चाहते। अब तो मौजूदा व्यवस्था में जीन होगा अंतरास्ट्रीय ख्याति प्राप्त  मिली है देस को। अपने नीड़ से एक एक करके टर टर कर रहे है पशू और जानवरो सी एकता मत दिखाओ मानव की  मानवता दिखने में ही भलाई है। उस खिताब की तौहीन कानून इजाजत नही देता। देस मुस्किल से पटरी पे दौड़ने लगा है दौड़ने दो इसे ब्रेक मत लगाना आने वाली पीढ़ियां माफ़ नही करेंगी। 

Those Who Love Themselves, Cannot Love Others

From the diary of SayedJaffrey -- the famous bollywood character actor ---
I was 19 when I was married to Mehrunima who was 17. As I grew up, I was very fascinated by the british culture in colonial India. I learnt to speak English fluently, wear suits with grace, and developed impeccable etiquettes. But Mehrunima grew up to be my complete opposite - homely, a typical housewife. All my advices and admonishments couldn't change her basic personality - an obedient wife, a doting mother and a good homemaker. But she was not what I wanted. More I tried to change her, more we drifted apart.
Gradually she metamorphosed from a cheerful affectionate young girl into a quiet insecure woman. Meanwhile I started getting attracted to a co-actor of mine who was all what I wanted in my wife. After 10 years of marriage, l divorced Mehrunima, left my home and married my co- actor. I had ensured financial security of Mehrunima and my kids . For about 6-7 months everything went well. Then I started realising, my new wife was not caring and affectionate. She was only concerned about her beauty, her ambitions, her wants and desires. Sometimes I missed Mehrunima's caring touch and concern for my welfare.
Life moved on . I and my new wife were 2 persons living in a house, not one soul living in a home. I never went back to find out what happened to Mehrunima and my kids.
After about 6 -7 years of my second marriage, I came across an article on a Madhur Jaffrey, an upcoming famous chef who had recently launched a book of her own recipes. The moment I looked at the picture of the smart elegant lady, I was stunned. It was Mehrunima. But how could it be ??? She had remarried and changed her maiden name too.
I was shooting abroad at that time. She lived in US now. I caught the next flight to US. I inquired about her where abouts and went to meet her. She refused to see me. My daughter who was 14, and son who was 12, told her they wanted to talk to me one last time. Her new husband was by her side. He was also my children's legal father now.
To this date, I cannot forget what my children told me.
They told me that their new father knows the meaning of true love. He accepted Mehrunima as she was and never tried to change her into what he himself was, because he loves her more than he loves himself. He let her evolve at her own pace and never tried to force his wishes on her. He accepted and enjoyed her person as it was.
And she has bloomed into a confident loving affectionate self reliant lady today under her second husband's selfless love and acceptance.
Where as his selfishness, demands and unacceptance of her persona had crushed her and then in his selfishness he had discarded her.
He Never Loved Her, He Had Always Loved Himself ,
And Those Who Love Themselves, Cannot Love Others.

मैं राम, कृष्ण और यहाँ तक कि रावण में समझ नहीं पा रहा ....

"मैं राम, कृष्ण और यहाँ तक कि रावण में समझ नहीं पा रहा कि हमारा नैतिक चारित्रिक कुतुबनुमा कौन था ? ...किसके आचरण में जिन्दगी के व्याकरण तलाशें ? ...चूंकि यह तीनो ही चरित्र मौलिक होते हुए भी विपरीत ध्रुव हैं इस लिए असमंजस है ...सही कह रहा हूँ कन्फ्यूज़ हूँ यार ...अगर एक को नायक मानते हैं तो दूसरे और तीसरे को खारिज करना पड़ेगा ...आप राम की चारित्रिक प्रतिस्थापना और शैली से प्रेरणा लेंगे तो कृष्ण को खारिज करना पड़ेगा ...राम आत्म केन्द्रित हैं और कृष्ण विकेन्द्रित ...राम अनुष्ठान पोषक हैं और यथावत के पक्षधर तो कृष्ण अनुष्ठान विरोधी और यथावत द्रोही ...यथावत से तथागत तक की भूगोल ...राम वर्जना की मर्यादा में थे तो कृष्ण सर्जना की सीमान्त के यात्री ...दरअसल भारतीय समाज की विडंबना ही यही है कि हमारी आस्था अंतर्द्वंद्व में है और परिणामस्वरूप निष्ठा एकनिष्ठ नहीं ...बिना निष्ठा के प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ता समाज हैं हम . हम राजनीति से घृणा करते हैं और आध्यात्मिक होने का ढोंग करते हैं जबकि बिना राजनीतिक हुए आध्यात्मिक हुआ ही नहीं जा सकता है . देखिये ...आत्मवंचना कीजिये ... वैदिक युग की राजनीति त्रेता यानी राम के युग का आध्यात्म थी ...त्रेता की राजनीति द्वापर यानी कृष्ण के युग का आध्यात्म हो गयी फिर द्वापर की राजनीति में मोहम्मद -मोबीन , ईसा , जिब्राइल , मेसेडोनिया ,बुद्ध का राजनीतिक घाल मेल हुआ तो वर्तमान आध्यात्म की खट्टी- मीठी दालमोठ हम खा ही रहे हैं ...पर याद रहे दालमोंठ से पोषण नहीं होता . इसी वैचारिक अंतर्द्वंद्व और असमंजस में भारत समझ ही नहीं पाया कि क्या करे ? ... गुजरे डेढ़ हजार साल बदलते मालिकों की गुलामी में गुजरते गुजरते हमने गुजार दिए ...हम दिशा हीन थे ...हम पर नायकों की एक लम्बी फेहरिश्त तो थी पर हमारे नायक विपरीत ध्रुवों के थे ...हम दिशाहीन थे और परिणामस्वरूप दशाहीन भी ...हम नहीं तय कर पाए कि "शस्त्रार्थ" संप्रभुता का श्रोत है या "शास्त्रार्थ" से संप्रभुता का सृजन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का शिल्प देगा ...यह असमंजस बुद्ध के प्रादुर्भाव में प्रबुद्धों में देखी गयी ...यह असमंजस मोहम्मद और मोबीन में देखी गयी ...यह असमंजस महावीर में देखी गयी ...यह असमंजस गुरु नानक और गुरु गोविन्द सिंह में देखी गयी और क्रमशः हमारी भारतीय अंतर्चेतना में समाहित हो गयी ...यह असमंजस भगत सिंह और गाँधी की विचारधारा और व्यक्तित्व को अपने तीतर -बटेर की तरह लड़ा रहे हम लुच्चे -टुच्चे बुद्धिजीवियों में भी दिखी ...शस्त्रार्थ बनाम शास्त्रार्थ का अंतर्द्वंद्व जारी था ...धर्म की शैली लोकतांत्रिक की अपेक्षा अधिनायकवादी अधिक है और भारतीय राजनीति की शैली अधिनायकवाद की अपेक्षा लोकतांत्रिक अधिक है ...और हम इसी असमंजस में किंकर्तव्य विमूढ़ .
मैं राम, कृष्ण और यहाँ तक कि रावण में समझ नहीं पा रहा कि हमारा नैतिक चारित्रिक कुतुबनुमा कौन था ? ...किसके आचरण में जिन्दगी के व्याकरण तलाशें ? ...चूंकि यह तीनो ही चरित्र मौलिक होते हुए भी विपरीत ध्रुव हैं इस लिए असमंजस है .
हम पर तमाम ध्रुव हैं ...अलग -अलग धार्मिक ध्रुव ...अलग -अलग मजहबी कुतुबनुमा ...हमारी निष्ठा विभाजित है और प्रतिष्ठा की लड़ाई जारी ....एक निष्ठा के बिना प्रतिष्ठा संभव नहीं ."