"मैं राम, कृष्ण और यहाँ तक कि रावण में समझ नहीं पा रहा कि हमारा नैतिक चारित्रिक कुतुबनुमा कौन था ? ...किसके आचरण में जिन्दगी के व्याकरण तलाशें ? ...चूंकि यह तीनो ही चरित्र मौलिक होते हुए भी विपरीत ध्रुव हैं इस लिए असमंजस है ...सही कह रहा हूँ कन्फ्यूज़ हूँ यार ...अगर एक को नायक मानते हैं तो दूसरे और तीसरे को खारिज करना पड़ेगा ...आप राम की चारित्रिक प्रतिस्थापना और शैली से प्रेरणा लेंगे तो कृष्ण को खारिज करना पड़ेगा ...राम आत्म केन्द्रित हैं और कृष्ण विकेन्द्रित ...राम अनुष्ठान पोषक हैं और यथावत के पक्षधर तो कृष्ण अनुष्ठान विरोधी और यथावत द्रोही ...यथावत से तथागत तक की भूगोल ...राम वर्जना की मर्यादा में थे तो कृष्ण सर्जना की सीमान्त के यात्री ...दरअसल भारतीय समाज की विडंबना ही यही है कि हमारी आस्था अंतर्द्वंद्व में है और परिणामस्वरूप निष्ठा एकनिष्ठ नहीं ...बिना निष्ठा के प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ता समाज हैं हम . हम राजनीति से घृणा करते हैं और आध्यात्मिक होने का ढोंग करते हैं जबकि बिना राजनीतिक हुए आध्यात्मिक हुआ ही नहीं जा सकता है . देखिये ...आत्मवंचना कीजिये ... वैदिक युग की राजनीति त्रेता यानी राम के युग का आध्यात्म थी ...त्रेता की राजनीति द्वापर यानी कृष्ण के युग का आध्यात्म हो गयी फिर द्वापर की राजनीति में मोहम्मद -मोबीन , ईसा , जिब्राइल , मेसेडोनिया ,बुद्ध का राजनीतिक घाल मेल हुआ तो वर्तमान आध्यात्म की खट्टी- मीठी दालमोठ हम खा ही रहे हैं ...पर याद रहे दालमोंठ से पोषण नहीं होता . इसी वैचारिक अंतर्द्वंद्व और असमंजस में भारत समझ ही नहीं पाया कि क्या करे ? ... गुजरे डेढ़ हजार साल बदलते मालिकों की गुलामी में गुजरते गुजरते हमने गुजार दिए ...हम दिशा हीन थे ...हम पर नायकों की एक लम्बी फेहरिश्त तो थी पर हमारे नायक विपरीत ध्रुवों के थे ...हम दिशाहीन थे और परिणामस्वरूप दशाहीन भी ...हम नहीं तय कर पाए कि "शस्त्रार्थ" संप्रभुता का श्रोत है या "शास्त्रार्थ" से संप्रभुता का सृजन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का शिल्प देगा ...यह असमंजस बुद्ध के प्रादुर्भाव में प्रबुद्धों में देखी गयी ...यह असमंजस मोहम्मद और मोबीन में देखी गयी ...यह असमंजस महावीर में देखी गयी ...यह असमंजस गुरु नानक और गुरु गोविन्द सिंह में देखी गयी और क्रमशः हमारी भारतीय अंतर्चेतना में समाहित हो गयी ...यह असमंजस भगत सिंह और गाँधी की विचारधारा और व्यक्तित्व को अपने तीतर -बटेर की तरह लड़ा रहे हम लुच्चे -टुच्चे बुद्धिजीवियों में भी दिखी ...शस्त्रार्थ बनाम शास्त्रार्थ का अंतर्द्वंद्व जारी था ...धर्म की शैली लोकतांत्रिक की अपेक्षा अधिनायकवादी अधिक है और भारतीय राजनीति की शैली अधिनायकवाद की अपेक्षा लोकतांत्रिक अधिक है ...और हम इसी असमंजस में किंकर्तव्य विमूढ़ .
मैं राम, कृष्ण और यहाँ तक कि रावण में समझ नहीं पा रहा कि हमारा नैतिक चारित्रिक कुतुबनुमा कौन था ? ...किसके आचरण में जिन्दगी के व्याकरण तलाशें ? ...चूंकि यह तीनो ही चरित्र मौलिक होते हुए भी विपरीत ध्रुव हैं इस लिए असमंजस है .
हम पर तमाम ध्रुव हैं ...अलग -अलग धार्मिक ध्रुव ...अलग -अलग मजहबी कुतुबनुमा ...हमारी निष्ठा विभाजित है और प्रतिष्ठा की लड़ाई जारी ....एक निष्ठा के बिना प्रतिष्ठा संभव नहीं ."
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